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सहारनपुर में डंपर पलटा, मौके पर सात लोंगो की मौत,,आखिर कौन है जिम्मेदार,,!

Byadministrator

Nov 29, 2025

सहारनपुर में डंपर पलटा, मौके पर सात लोंगो की मौत,,आखिर कौन है जिम्मेदार,,!

 

 

( हर जिलों मे,, ऐसी घटनाओ से जिम्मेदार अधिकारियो को सबक लेना चाहिए,,ताकि दिल दहलाने वाली ऐसी घटनाओ की पुनरावृति न हो सके,,)

 

( बदहवास पिता बोले- 7 लोगों को खो दिया; मेरे घर में अब कोई नहीं बचा )

 

 

देहरादून हाईवे पर हादसे में एक ही खानदान के 7 लोगों की मौत हो गई। बेकाबू डंपर कार पर पलट गया। डंपर पर लदी बजरी भी कार पर गिरने से कार में बैठे लोगों की दर्दनाक मौत हो गई।

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हादसे के स्पॉट से सिर्फ 1.5Km दूर सैयद माजरा गली में मातम छाया हुआ है। 55 साल के महेंद्र सैनी ने इस हादसे में अपनी पत्नी रानी (50) और बेटे संदीप को खो दिया। कार में उनकी बेटी जूली, दामाद शेखर और नाती अनिरुद्ध भी थे।

 

उनके बड़े बेटे के ससुर उमेश सैनी ड्राइवर के बगल वाली सीट पर थे। साली के बेटे विपिन कार की पिछली सीट पर बैठे थे। करीब एक घंटे की मशक्कत के बाद सबके शव कार के अंदर से निकाले जा सके।

 

देर शाम रानी और संदीप की अर्थियां उठी, तो पूरा गांव इकट्‌ठा हो गया। वहीं, बाकी लोगों के शवों को दाह संस्कार के लिए हरिद्वार ले जाया गया।

 

कार के बचे हुए हिस्सों को क्रेन से उठाकर ले जाया गया। –

कार के बचे हुए हिस्सों को क्रेन से उठाकर ले जाया गया।

गांव का माहौल

 

महेंद्र सिर्फ इतना बोल सके- सब चले गए, घर खाली हो गया गांव में महेंद्र सैनी के घर की तरफ जाने वाली गली पर लोगों का जमावड़ा था। हम लोगों की बातों को समझते हुए इस घर तक पहुंच गए। यहां लोगों से हमने महेंद्र सैनी के बारे में पूछा। इशारे से हमें उन्हें दिखाया गया। महेंद्र बदहवास स्थिति में दिखे। बात करने की स्थिति में नहीं थे।

 

महेंद्र लड़खड़ाते कदमों से कभी आंगन में आते, कभी दरवाजे की ओर देखते। उन्हें देखकर ऐसा लगता कि जैसे उनकी आंखों के सामने अंधेरा ही अंधेरा था। लोग उन्हें संभाल रहे थे, मगर वह कुछ समझ नहीं पा रहे थे।

 

एक साथ परिवार के सदस्यों को हादसे में गंवाने के बाद वो सदमे में चले गए थे। ठीक से अपने परिजनों के नाम तक याद नहीं कर पा रहे थे। कोई उनसे पूछता बाबा, कौन-कौन था कार में? तो वो फफक पड़ते। कहते- बेटा…हमसे मत पूछो…सब चले गए…घर खाली हो गया।

 

लाल घेरे में महेंद्र दिख रह हैं, उन्हें संभालने के लिए गांव के लोग हर वक्त उन्हें घेरे दिखे। –

लाल घेरे में महेंद्र दिख रह हैं, उन्हें संभालने के लिए गांव के लोग हर वक्त उन्हें घेरे दिखे।

गांव के लोग बोले- संदीप की सांस चल रही थी, मगर बचा नहीं सके घर में परिवार के पड़ोसी सुरेंद्र नाथ से मुलाकात हुई। पूरे हादसे के बारे में वह कहते हैं- 27 नवंबर को गंगोह में रहने वाले महेंद्र के साले की तबीयत बिगड़ गई। बड़े बेटे प्रदीप और छोटे बेटे संदीप तुरंत कार लेकर निकल पड़े। रास्ते में ही मामा की मौत की खबर मिली। प्रदीप वहीं रुक गए, जबकि संदीप घर लौट आए।

 

28 नवंबर की सुबह परिवार के सदस्यों को मामा के अंतिम संस्कार में जाना था। महेंद्र की पत्नी रानी (50), बेटा संदीप (24), बड़ी बहन जूली (27), जूली का बेटा अनिरुद्ध (4), महेंद्र का दामाद शेखर (28), साली का बेटा विपिन (20) और समधी उमेश सैनी, कुल 7 लोग कार में बैठे थे। किसे मालूम था कि ये सफर उनके जीवन का अंतिम सफर बन जाएगा।

 

घर से 1.5 Km दूर दिल्ली-देहरादून नेशनल हाईवे के कट को पार करते वक्त कार के ऊपर एक बजरी से भरा डंपर गिर गया। संदीप की सांसें चल रही थीं, लेकिन अस्पताल पहुंचते-पहुंचते वो भी चला गया। बाकी सबकी जान तो मौके पर ही निकल गई। महेंद्र का घर, एक ही झटके में वीरान हो गया।

 

गांव में संदीप और उनकी मां रानी की चिताएं एक साथ जलाई गईं। –

गांव में संदीप और उनकी मां रानी की चिताएं एक साथ जलाई गईं।

महेंद्र बोले- मुझे क्यों छोड़ गए, ये दिन नहीं देखना पड़ता इधर घर के आंगन में महेंद्र गफलत में बस बड़बड़ा रहा थे, उनके हाथ कांप रहे थे, आवाज टूट रही थी। कहते हैं- मामा की मौत में शामिल होने के लिए क्यों चले गए? क्योंकि सिर्फ मैं ही घर पर अकेला था। मुझे भी लेकर जाते, तो ये दिन नहीं देखने पड़ते। महेंद्र की ये बातें सुनकर गांव का हर शख्स रो पड़ा।

 

जब उनसे परिवार के बारे में पूछना चाहा तो उन्होंने सिर्फ इतना ही बोला- बेटा…मेरे घर में अब कोई नहीं बचा…बस मैं और प्रदीप रह गए…बाकी सब चले गए।

 

महेंद्र के बेटे प्रदीप भी इस घटना के बाद परेशान थे। गांव के लोग उन्हें दिलासा दे रहे थे। –

महेंद्र के बेटे प्रदीप भी इस घटना के बाद परेशान थे। गांव के लोग उन्हें दिलासा दे रहे थे।

बेटे प्रदीप को गांव के लोगों ने पोस्टमॉर्टम हाउस जाने नहीं दिया वहीं महेंद्र का बड़ा बेटा प्रदीप भी मां और भाई की मौत के बाद बदहवास था। प्रदीप को रिश्तेदारों और ग्रामीणों ने अस्पताल और पोस्टमॉर्टम हाउस पर भी जाने नहीं दिया। कुछ रिश्तेदार और ग्रामीण ही पोस्टमॉर्टम हाउस पर मौजूद थे, हमने कुछ लोगों से बात करनी चाही, मगर कैमरे पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था।

 

वहीं, महेंद्र का बड़ा बेटा प्रदीप पूरी तरह टूट चुका है। एक तरफ अपनी मां रानी का पार्थिव शरीर, दूसरी तरफ भाई संदीप की चिता, दोनों को मुखाग्नि देते वक्त गांव रो रहा था और प्रदीप पत्थर-सा बन चुका था। उसके होंठों से बस इतना ही निकल पाया कि भगवान ने हमसे क्या छीना है, किसी से मत पूछो…मैं किस-किस को कंधा दूं।

 

प्रदीप अपनी मां, भाई, भांजे, बहन, बहनोई, और दो रिश्तेदारों को खो चुका है। उसके पास अब शब्द नहीं, सिर्फ दो सूखी आंखें और एक बेजान-सी चुप्पी बची है। सैयद माजरा में हर घर आज रो रहा है। महिलाएं महेंद्र के आंगन में बैठकर विलाप करती रहीं। कह रही थी- भगवान…कोई इंसान इतना दुख कैसे सह सकता है? वहीं, महेंद्र बार-बार एक ही बात दोहराते हैं कि हमने भगवान का क्या बिगाड़ा था? हमारा घर क्यों उजाड़ दिया। और प्रदीप…बस सिर झुकाए बैठा रहा

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