यह उन तथाकथित “बड़े” पत्रकारों के लिए करारा तमाचा है, जो खुद को पत्रकारिता का ठेकेदार समझ बैठे हैं और बाकी साथियों को “छोटा-बड़ा” या “फर्जी पत्रकार” कहकर अपना रुतबा दिखाता हैं
पत्रकारिता कोई रुतबा नहीं, न ही कमाई का जरिया—यह समाज के प्रति जिम्मेदारी है, जिसे आपने सौदेबाज़ी की दुकान बना दिया है।
आपकी कलम सच्चाई के लिए नहीं, सौदे की शर्तों पर चलती है। पहले अवैध खनन, झोलाछाप डॉक्टरों और भ्रष्ट तंत्र पर खबरें लिखकर “ईमानदार” बनने का ढोंग, फिर चुप्पी—क्योंकि कहीं से ₹500 महीना, कहीं से ट्रैक्टर के ₹2000–₹5000 तय हो गए। जिस दिन महीना बंद, उसी दिन खबरों की बरसात। यह पत्रकारिता नहीं, यह उगाही की डायरी है।
आपका एजेंडा जनहित नहीं, “मुझे मिल रहा है या नहीं” तक सीमित है। ठेले वाले भी आपकी नज़र से नहीं बचते—गरीब की रोज़ी में भी हिस्सेदारी चाहिए। और जो सच्चे पत्रकार अवैध काम उजागर करते हैं, उनसे आपकी नफ़रत इसलिए उबलती है क्योंकि उनकी सच्चाई आपकी आमदनी पर चोट करती है। अवैध बंद होगा तो आपकी दुकान बंद होगी—यही डर आपको लाल पीला कर देती है
गरीब, पीड़ित, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क—ये शब्द आपकी खबरों में इसलिए नहीं दिखते क्योंकि इनसे “महीना” नहीं बनता। आप खुद को सबसे ईमानदार बताकर मंच सजाते हैं, पर आईना देखना भूल जाते हैं। याद रखिए, पत्रकारिता पद नहीं, प्रमाण है। कलम बिकाऊ होगी तो भरोसा टूटेगा। और जब भरोसा टूटता है, तो न बड़ा बचता है न छोटा—सिर्फ़ नकाब गिरता है।
